
जंग-ए-सिफिन का इतिहास हिंदी में – Jung e Siffin history in hindi
जंग ए सिफ़्फ़ीन इस्लामी तारीख़ की वो जंग है जिसने मुसलमानों के बीच हक़ – बातिल और मोमिन – मुनाफिक़ीन के फ़र्क़ को साफ़ कर दिया।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!जंग ए सिफ़्फ़ीन की वजह – The Cause of the Battle of Siffin – Jung e Siffin
साल 657 ईस्वी में जब तीसरे ख़लीफ़ा हज़रत उस्मान रज़ि अल्लाहो तआला अन्हा की शहादत हो गयी और उम्मत ने हज़रत अली रज़ि अल्लाहो तआला अन्हा को चौथा ख़लीफ़ा चुन लिया, तब शाम यानी आज का सीरिया के गवर्नर मुआविया बिन सुफ़ियान ने हज़रत उस्मान के क़ातिलों को पकड़ने का मुतालबा हज़रत अली से करने लगा, जबकि हज़रत अली का कहना था कि असली मुज़रिम को पकड़ने के लिये थोड़ा वक़्त चाहिए , लेकिन मुआविया बिन सुफ़ियान इस कदर अपनी ज़िद पे आ गया और उसने हज़रत अली से जंग करने का इरादा बना लिया।
जंग ए सिफ़्फ़ीन की शुरुआत प्यास से – The Battle of Siffin began with thirst – Jung e Siffin
फरात नदी के किनारे सिफ़्फ़ीन के मैदान में ये दोनों फौजे टकराने वाली थी। जंग की शुरुआत प्यास से हुई जब मुआविया की फौज ने फरात नदी पे कब्ज़ा कर लिया और हज़रत अली के लश्करों के लिए पानी बंद कर दिया। हजरत अली के सिपहसालार मलिक-ए-अश्तर ने एक जबरदस्त हमले में पानी का कब्जा वापस ले लिया। लेकिन यहाँ हज़रत अली ने वो किया जो इतिहास में कम ही मिलता है। उन्होंने कहा—”पानी पर सबका हक है।” उन्होंने मुआविया के प्यासे सैनिकों को भी पानी पीने की इजाजत दे दी।
जंग ए सिफ़्फ़ीन की वो भयानक रात – लैलात अल हरीर – That Terrifying Night of the Battle of Siffin, Laylat al-Harir – Jung e Siffin
कई दिनों तक छोटी-मोटी झड़पें होती रहीं, लेकिन फिर आई वो रात जिसे ‘लैलात-अल-हरीर’ कहा जाता है। पूरी रात बिना रुके जंग चलती रही। चीखों और तलवारों के टकराने की आवाजों से मैदान गूंज उठा। सुबह होते-होते अली का लश्कर जीत के करीब था। मलिक-ए-अश्तर मुआविया के खेमे की ओर बढ़ रहे थे।
जंग ए सिफ़्फ़ीन में मुआविया की साजिश वाली चाल – Muawiyah’s Deceptive Stratagem in the Battle of Siffin – Jung e Siffin
जब मुआविया के लश्कर को हार सामने नजर आने लगी, तो अम्र इब्न अल-आस की सलाह पर मुआविया ने एक चाल चली और अपनी फौज को हुक्म दिया कि वो नेजों पर कुरान के पन्ने बुलंद कर दे और वो चिल्लाने लगे —”हमारे बीच खुदा की किताब फैसला करेगी!” ये एक ऐसी चाल थी जिसने हज़रत अली के जीतते हुए लश्कर के कदम रोक दिए। हज़रत अली ने आगाह किया कि ये सिर्फ एक पैंतरा है, लेकिन उनके अपने ही कुछ सिपाही जंग को रोकने पर अड़ गए।
जंग ए सिफ़्फ़ीन में खारजी – Kharji in the Battle of Siffin – Jung e Siffin
जंग रुक गई और ‘सालिसी’ यानी मध्यस्थता का फैसला हुआ। लेकिन इस फैसले से एक नया गुट ‘खारिजी’ पैदा हुआ, जिन्होंने हजरत अली का साथ छोड़ दिया। सिफ़्फ़ीन की इस जंग में करीब 70,000 मुसलमान शहीद हुए।
जंग ए सिफ़्फ़ीन का पैग़ाम – The Message of Battle of Siffin – Jung e Siffin
सिफ़्फ़ीन का मैदान आज भी खामोश है, लेकिन वहां से उठने वाले सवाल आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। ये कहानी है उस दौर की, जब सियासत और उसूलों के बीच की लकीर बहुत धुंधली हो गई थी। ये सिर्फ एक जंग नहीं थी, बल्कि इसने खिलाफत के निजाम और इस्लामी इतिहास की दिशा हमेशा के लिए बदल दी। और ये बता दिया कि कभी -2 उन मुनाफ़िक़ चेहरों को भी बेनक़ाब करना चाहिए जो हक़ के रास्ते को रोकते है।
Jung e Siffin : https://www.youtube.com/watch?v=GO2LpMBWQSM&t=24s
Wikipedia – Battle of Siffin : https://en.wikipedia.org/wiki/Battle_of_Siffin
Muawiya bin Sufiyan ki Haqeeqat : https://mahmoodkhan.in/muawiya-bin-sufiyan-ki-haqiqat-quran-aur-hadees/
Hypocrisy of Muawiya bin Sufiyan – in the light of Holy Quran and Authentic Hadith – 3 imp. Hadees